बिकाऊ मीडिया पर शायरी आज के दौर में पत्रकारिता और मीडिया की भूमिका पर सवाल उठाने वाली बेबाक अभिव्यक्ति है। जब खबरों में सच्चाई से ज्यादा किसी खास पक्ष का प्रभाव दिखाई देता है, तब लोगों के मन में मीडिया की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। ऐसी ही भावनाओं को शायरी के माध्यम से शब्द दिए जा सकते हैं।
मीडिया को लोकतंत्र का महत्वपूर्ण स्तंभ माना जाता है। एक जिम्मेदार पत्रकारिता का उद्देश्य तथ्यों को सामने रखना और समाज के जरूरी मुद्दों पर लोगों को जागरूक करना है। लेकिन जब खबरों में निष्पक्षता की कमी महसूस होती है, तो बिकाऊ मीडिया पर शायरी व्यवस्था पर व्यंग्य करने का एक तरीका बन जाती है। नीचे दी गई शायरियां इसी विषय पर विचार और सवाल रखने का प्रयास हैं।
बिकाऊ मीडिया पर शायरी

खबरों की कीमत जब बाजार तय करने लगे,
सच बोलने वाले भी फिर डरने लगे।
कलम का काम था सच को सामने लाना,
अफसोस उसे भी सीख लिया गया बिक जाना।

सच की आवाज दबाकर शोर दिखाया जाता है,
कभी-कभी खबरों में सच भी छिपाया जाता है।
जहां खबरों का सौदा होने लगे सरेआम,
वहां पत्रकारिता कैसे रख पाएगी अपना नाम।

खबर वही नहीं जो पर्दे पर दिखाई जाए,
सच्ची खबर वो है जो हकीकत बताई जाए।
कलम अगर किसी के इशारे पर चलने लगे,
तो पत्रकारिता का भरोसा कैसे बचने लगे।

मीडिया का आईना साफ रहना चाहिए,
हर खबर में सच का साथ रहना चाहिए।
जब खबर से ज्यादा कीमत मायने रखने लगे,
तब सवाल पत्रकारिता पर उठने लगे।
सच लिखना पत्रकार की पहचान होनी चाहिए,
हर खबर में जनता की आवाज होनी चाहिए।
खबरों के बाजार में सच अकेला खड़ा है,
आज भी ईमानदार कलम पर भरोसा बड़ा है।
दलाल पत्रकारिता पर शायरी

खबरों को अगर फायदे से तौला जाएगा,
तो सच का चेहरा कहां नजर आएगा।
कलम का सौदा होने लगे जब स्वार्थ के साथ,
फिर खबरों में कैसे बचेगी सच्चाई की बात।
पत्रकारिता का मतलब सिर्फ खबर सुनाना नहीं,
सच के लिए हर मुश्किल से घबराना नहीं।
जो कलम सच के लिए आवाज उठाती है,
वही पत्रकारिता समाज में विश्वास जगाती है।
दलाली से नहीं, सच्चाई से नाम बनता है,
ईमानदार पत्रकार ही जनता के दिल में बसता है।
मीडिया पर व्यंग्य शायरी
खबरों में अगर सच कम और तमाशा ज्यादा हो,
तो समझ लेना सवालों का बाजार ज्यादा हो।
हर चमकती खबर सच्ची हो, यह जरूरी नहीं,
हर दिखने वाली तस्वीर पूरी कहानी नहीं।
शोर बहुत है खबरों की इस दुनिया में,
सच आज भी खामोश बैठा है कहीं कोने में।
शीर्षक बड़ा हो सकता है, खबर बड़ी नहीं,
हर दिखाई गई बात पूरी सच्चाई नहीं।
पत्रकारिता पर शायरी
कलम में ताकत हो तो बदलाव आता है,
सच्चा पत्रकार समाज को आईना दिखाता है।
पत्रकारिता का धर्म सवाल उठाना है,
सच को बिना डर के सामने लाना है।
जिस कलम में ईमानदारी रहती है,
उसकी आवाज दूर तक सुनाई देती है।
खबरों का मकसद डर फैलाना नहीं,
बल्कि समाज को सही जानकारी दिलाना है।
बिकाऊ खबरों पर शायरी
खबर बिक जाए तो भरोसा टूट जाता है,
सच छिप जाए तो समाज भी रूठ जाता है।
खबरों का बाजार सज गया तो क्या हुआ,
सच बोलने वाला आज भी खड़ा हुआ।
जिस खबर में सच का अंश नहीं होता,
उस शोर का कोई अर्थ नहीं होता।
पैसों से खबर का रंग बदल जाए अगर,
तो जनता किस पर करे भरोसा फिर।
मीडिया की सच्चाई पर शायरी
आईना वही अच्छा जो चेहरा साफ दिखाए,
मीडिया वही अच्छा जो सच्चाई सामने लाए।
सवाल पूछना पत्रकारिता की पहचान है,
सच के साथ खड़ा रहना उसकी शान है।
खबरों में तथ्य और शब्दों में जिम्मेदारी हो,
तभी पत्रकारिता समाज के लिए हितकारी हो।
सच्ची खबर कभी शोर की मोहताज नहीं होती,
ईमानदार कलम किसी के आगे झुकी नहीं होती।
निष्कर्ष
बिकाऊ मीडिया पर शायरी केवल आलोचना का माध्यम नहीं, बल्कि पत्रकारिता में निष्पक्षता, जिम्मेदारी और सच्चाई के महत्व को याद दिलाने का एक तरीका भी है। मीडिया समाज तक जानकारी पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, इसलिए खबरों में तथ्य, संतुलन और जिम्मेदारी बेहद जरूरी हैं।
हमें किसी भी खबर को आंख बंद करके मानने के बजाय उसके स्रोत और तथ्यों को समझने की आदत विकसित करनी चाहिए। साथ ही, आलोचना करते समय पूरे मीडिया या सभी पत्रकारों को एक जैसा मानना भी उचित नहीं है। ईमानदार और जिम्मेदार पत्रकारिता आज भी समाज के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।